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शनैः , शनैः आ रहा बसंत , वादे गो निभा रहा बसंत .
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भारत में यह बसंत के आगमन का समय है . प्रकृतिक सक्रियता का काल होता है यह . शीत के गमन के साथ ही प्रकृति सुषुप्तावस्था तज कर जाग जाती है . अधिकांश पेड़ – पौधे नव किसलय से अच्छादित होकर हर तरफ एक नई ताजगी भर देती है . सर्दियों के दीर्घ अंतराल के पश्चात जिंदगी सहज रवानी पाती है . एक खुशहाल राहत का अनुभव मिलता है . आम के वृक्ष मंजरियों से सजकर , मीठी-मधुर खुशबू से सब को खुश और आशान्वित कर देती है . बाग- बगीचे विभिन्न रंग-रुप के फूलों व खुशबुओं से भर जाती हैं और सजी- धजी हुईं तितलियों व भौरों को निरंतर अपनी ओर आकृष्ट करती हैं . इस मौसम की खुशियां और सुंदरता मानव मन को कलात्मकता से भर देता है और हम जीवनोत्सव के अनिवार्य गतिविधियों में नए उत्साहो- उमंग के साथ फिर से रमने लगते हैं . हमें अपने शरीर में ऊर्जा की एक नई लहर की अनुभूति होती है . मन में रंच मात्र उदासी बाकी नही रहती बल्कि एक नई स्फूर्ति का भी अनुभव रहता हैं . सुबह – सबेरे से संध्या तक विभिन्न चिड़ियो, पक्षियों व कोकिल के कुहुक से गुंजायमान वातावरण मन को तरंगित रखता है . रातें शीतल – स्वच्छ व निर्मल चांदनी वाली होती हैं . आकास साफ होता है . खेत से पके फसलों को संग्रह करने का समय हता है यह . किसान बहुत ही खुश रहते हैं . सरसो के पौधे में बासंती फूल निरंतर अपनी खुशियों का इजहार कर रही होती हैं . प्रकृति की एक – एक अवयव बसंत का स्वागत करती हैं . प्रकृति के हर
जर्रे का मन मुदित हो उठता है. कुछ यूं . . .
शनैः – शनैः आता बसंत ,
हर जर्रे में गाता बसंत .
ठूंठों में भी फूटे कोंपल,
मन-भाव बहे हैं कल-कल.
उमंग बन छाता बसंत,
वादे गो निभाता बसंत.
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✍️ जे आर गंभीर
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